Saturday, February 16, 2008

रचना को लौटाओं व संतोषी को न्‍याय दिलाओं संघर्ष अभियान

अब तक का घटनाक्रम -
5 फरवरी
सामाजिक संगठनों द्वारा प्रस्तावित धरना के ठीक दो दिन पहले 5 फरवरी को सामाजिक कार्यकर्ता वी0के0 राय की पुत्री रचना राय उम्र 20 वर्ष, काषी नरेश स्नात्कोत्तर महाविद्यालय, भदोही में बी0ए0 द्वितीय वर्ष की छात्रा है, का दिनांक 5 फरवरी 2008 को कॉलेज जाते वक्त अपहरण हो गया।
5 फरवरी की रात को वी.के.राय व बाकि साथियों द्वारा ज्ञानपुर कोतवाली में रचना राय के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करायी।

6 फरवरी
6 फरवरी को वी.केराय व स्थानीय संगठनों, जिनमें जौनपुर, प्रतापगढ़, बनारस व इलाहाबाद के साथी भी शामिल थे, ने कचहरी, भदोही में इस घटना के विरोध में धरना प्रदर्शन किया और बाद में साथी अनशन में बैठ गये।

7 फरवरी
एसपी भदोही ने अनशन पर बैठे साथियों से अनशन इस आवश्‍वासन पर उठवा दिया कि वे 24 घंटे के अन्दर लड़की को बरामद कर देंगे। एसपी ने यह भी कहा कि अगर आप लोग अनशन पर बैठे रहेंगे तो हम अपनी पूरी ऊर्जा लड़की को बरामद कराने मे नहीं लगा पायेंगे।

7 फरवरी को ही मैसवा व अन्य संगठनों ने प्रदेश के बाकि जिलों में इसके खिलाफ़ विरोध दर्ज कराया और जिलाधिकारी के माध्यम से सीएम को ज्ञापन भेजा

10 फरवरी
गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाष जायसवाल से संदीप पाण्डेय ने सम्पर्क किया, जिस पर गृह राज्य मंत्री ने तत्काल कार्यवाही करने की बात कही।

11 फरवरी
वी.के.राय के राय प्रशासन के रैवये से क्षुब्ध होकर आमरण अनषन पर 11 फरवरी को बैठ गये। उस दिन बाकि जिलों से कई सामाजिक संगठनों के लोग शामिल थे। लखनऊ से एक टीम संदीप पाण्डेय की अगुवाई में भदोही गयी। यह टीम एसपी व डीआईजी से मिली। एसपी व डीआईजी ने पुन: 24 घण्टे की मोहलत मांगी।

लखनऊ में एक टीम गृह सचिव से मिली, गृह सचिव ने तुरंत एसपी को फोन कर इस केस पर जल्द कार्यवाही की बात कही और संगठनों की ओर से गयी टीम को आवश्‍वासन दिया की जल्द ही हम केस को सुलझा लेंगे।

12 फरवरी
भदोही में लगातार बाकि जिलों से संगठन के लोग शामिल हो रहे थे, वहां पर वी.के.राय आमरण अनशन पर बैठे थे। लखनऊ में बाकि संगठनों इस केस में प्रशासन के असंवेदनशील रैवये से क्षुब्ध होकर अगले दिन इस घटना के विरोध में मौन जुलुस निकालने का निर्णय लिया।

13 फरवरी
पटेल पार्क, हजरतगंज में करीबन 100 साथी मौन जुलुस में शामिल थे। मौन जुलुस के दौरान प्रमुख सचिव ने संगठनों की ओर से टीम को मिलाने के लिए बुलावा भेजा। पर प्रमुख सचिव का रवैया बहुत ही असहयोगात्मक रहा। उन्होंने कहा कि हमारी पुलिस इस काम में लगी हुई है। संगठनों की इस मांग को भी ठुकरा दिया कि एसपी भदोही को हटाकर किसी योग्य व निष्पक्ष व्यक्ति को इस केस की जिम्मेदारी दी जाये।

मौन जुलुस के बाद और प्रमुख सचिव के असहयोगात्मक रवैये को देख संगठनों ने इसे आंदोलन का रूप देते हुए रचना को लौटाओ संघर्ष अभियान के नाम से एकजुट होकर काम करने का संकल्प लिया है। और 14 फरवरी को एक प्रेस कांफ्रेस करने का निर्णय लिया।

14 फरवरी
अम्बेडकर महासभा में एक प्रेसवार्ता आयोजित की गयी। जिसमें प्रसिद्व सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय, रूपरेखा वर्मा, अरूधंती धुरू, चितरंजन सिंह व जशोधरादासगुप्ता आदि ने मीडिया के साथी को अब तक हालात व आगे की रणनीति के बारे में बताया।

भदोही में बाकि सामाजिक कार्यकर्ताओं के दबाव के चलते वीकेराय ने आमरण अनशन तोड् दिया, अब यह आमरण अनशन क्रमिक आमरण अनशन की तरह चलाया जा रहा है।

15 फरवरी
इस दौरान भदोही के साथियों ने शहर के आम लोगों से अपील की वो भी इस लडाई में शामिल हों, जिसके चलते कल 15 फरवरी को वकीलों ने भदोही शहर में चक्‍का जाम लगाया। लखनउ से म‍हिला संगठनों की ओर से प्रतिनिधि मंडल भदोही गया है।

आज 16 फरवरी को ज्ञानपुर कॉलेज, जहां रचना पढती थी, वहां के छात्र व छात्राओं ने विरोध प्रदर्शन किया। लखनउ में लखनउ विश्‍वविघालय में छात्र व छात्राओं ने भी प्रदर्शन किया, प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने युवा साथियों के बैनर व प्‍लेक कार्ड छिन लिये और उन्‍हें प्रदर्शन नहीं करने दिया। वहीं धरना स्‍थल में सामाजिक संगठनों ने आज से लखनउ में धरना शुरू कर दिया है, करीबन 50 लोग इससे शामिल थे। यह क्रमिशन धरना तब तक चलता रहेगा जब तक रचना की वापसी नहीं हो जाती और संतोषी को न्‍याय नहीं मिल जाता।
इस घटना में पुलिस की उदासीनता और आरोपियों के साथ मिलीभगत के चलते आज 12 दिन बीत जाने के बाद भी उसका कोई पता नहीं चल सका है। अब तक प्रशासन की तरुफ से सिर्फ इतना हुआ कि भदोही शहर के कोतवाल को बदल दिया गया है।

सामाजिक व मानवाधिकार संगठनों ने प्रशासन के बनारस डी0आई0जी0 से लेकर, गृहसचिव व प्रमुख सचिव, उत्तर प्रदेश तक न्याय के लिए गुहार लगाई, पर अभी तक कोई कार्यवाहीं नहीं हुई है।

आप सभी भदोही व लखनउ स्‍तर पर हो रहे विरोध में शामिल होकर इस अभियान को मदद करें।
अगर कुछ अपडेट छुट गया हो, तो कृपया उसे जोड दें।

Friday, February 8, 2008

एक अपील - सामाजिक कार्यकर्ता वी;के;राय व पुष्‍पा राय की बेटी के अपहरण मामले में सरकार पर दबाव बनाने हेतु आगे आयें

राय परिवार इस समय संकट की स्थिति में है, उनका परिवार बहुत टूट गया है, पूरा परिवार पिछले 4 दिन से सोया नहीं है, उनकी एक लड्की जो पिछले 4 दिन से कुछ खा तक नहीं रही थी, कल 8 तारीख की रात को उसे अस्‍पताल में भर्ती कराना पडा है।

आप सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं से अपील है कि इन सामाजिक कार्यकर्ताओं का साथ दे। आप अपने संबंधों के माध्‍यम से प्रशासन व पुलिस पर दबाव बनाकर लड्की को खोजने के लिए हर संभव मदद करें। इस घटना पर तुरंत कोई कार्यवाही करने में आपके विचार व सहयोग अपेक्षित है।

5 फरवरी 2008 को भदोही के संत रविदासनगर से वीकेराय व पुष्‍पा राय की 20 साल की बेटी का अपहरण हो गया, उनकी लड्की ज्ञानपुर में काशीनरेश राजकीय स्‍नातकोत्‍तर महाविघालय में बीए द्वितीय वर्ष में पढ्ती है, रोजाना की तरह 5 फरवरी को वह कॉलेज के लिए 9 बजे घर से निकली थी, और उसके बाद घर के लौट के नहीं आयी। अंदेशा जताया जा रहा है कि लडकी का अपहरण हो गया है।

इस घटना को वी के राय और पुष्प राय द्वारा एक कालीन बुनकर की बेटी के यौनिक शोषण वहां के कालीन निर्माता के खिलाफ् उठाये के मुद्दे के साथ जोड् कर देखा जा रहा है। वी के राय और पुष्प राय दोनो इस कालीन बुनकर की लड़की को अधिकार व न्‍याय दिलाने के लिए सहयोग कर रहे थे, दिनांक 7 फरवरी २००८ को अन्य सामाजिक संगठनों के समर्थन से एक धरना प्रदर्शन की घोषणा भी की गयी थी. लेकिन धरने से ठीक दो दिन पहले वी के राय और पुष्प राय की ही बेटी का अपहरण हो गया.

5 फरवरी की शाम को इस घटना की रिपोर्ट कोतवाली ज्ञानपुर में सेक्शन ३०३ और ३६६ के तहत रजिस्टर करायी गयी। लेकिन आज 4 दिन बित जाने के बाद भी पुलिस के हाथ कोई ठोस सबूत नहीं मिला है। पुलिस पिछले दो दिन से आश्‍वासन दिये जा रही है कि आज शाम तक हम कोई न कोई सुराग ढूढ लेंगे, पर अभी तक बिटिया बरामद नहीं हुई है।

Monday, October 8, 2007

यह डर पुरूष का है या उसके पुरूषत्व का

  • घरेलू हिंसा से महिलाओं का बचाव कानून 2005

    घरेलू हिंसा कानून 2005 के लगभग एक साल के सफर में इस कानून को पुरूषों के खिलाफ़, घरफोडू व भारतीय संस्कृति के खिलाफ़ आदि तरीके से स्थापित करने की कोषिषे पूरजोर तरीके से की जा रही हैं। आम समाज को इस कानून के दुरूप्रयोग का खौफ दिखाया जा रहा है। 26 अगस्त 2007 को दिल्ली में ''पुरूष बचाओ'' एक बड़ी रैली आयोजित हुई, जिसे मीडिया ने जबरदस्त तरीके से हाईलाईट किया, उसे रैली में इस कानून के विरोध में स्वर साफ सुनायी दे रहे थे।
    मेरे जेहन में सवाल उठ रहा है कि आखिर क्यों समाज विषेषकर पुरूष इससे डरा हुआ है, क्यों इसका विरोध है? दबे पांव राजनैतिक लोग, मीडिया व समाज के प्रबुध्द वर्ग भी अपनी आपत्ति दर्ज कर रहे हैं।
    इस कानून की जितनी चर्चा इसके सकारात्मक पहलू और इसकी सार्थकता पर हो रही है, उससे कहीं ज्यादा इस कानून के विरोध में और इसकी निरर्थकता को लेकर चर्चाएं हो रही हैं। तरह-तरह की बातें इस कानून के लिए बारे में कहीं जा रही है, इसके औचित्य पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं।
    मैं यहां पर महिला व बाल विकास केन्द्रिय मंत्री रेणुका चौधरी के उस कथन का हवाला देना चाहूंगा, जिसमें उन्होंने कहा कि ''इस कानून से पुरूषों में डर पैदा हुआ है तो मान लीजिए कानून सफल हो गया।''
    मेरे हिसाब से इस कथन का समाजषास्त्रीय विष्लेषण यह कहता है कि कानून पितृसत्तात्मक रूपी पूरे ढ़ाचे पर वार करता है, इस ढ़ाचे में जहां अभी तक पुरूष अपने पुरूष होने तथा महिला का महिला होने के नाते उस पर अपनी रोब जमा रहा था, उसे चोट पहुंच रही है, इस कानून से पुरूष के पौरूषत्व पर चोट पहुंच रही है। यह पुरूष को नुकसान नहीं अपितु पुरूष के पौरूषत्व पर हमला कर रहा है। जिससे पुरूष डरे हैं कि कहीं उन्हें पितृसत्ता के रूप में जो सत्ता मिली है, वह चली न जाये। यहां पर इसके स्वर इसलिए तीव्र और ज्यादा है क्योंकि यह कानून पितृसत्तात्मक ढ़ाचें पर वार कर रहा है। पुरूष अपने तथाकथित अधिकारों पर वैधानिक रोक लगाने से डर रहे हैं।

    मैं यहां पर इस कानून को लेकर उठे सवालों का विष्लेषण करने की कोषिष कर रहा हूं,। जिसमें पहला सवाल यह कानून घरफोडू है - तो क्या घर को बनाये रखने की जिम्मेदारी केवल महिला की है? क्या घर में शांति बनाये रखने के लिए उसे अपने उपर हो रहे सारे जुर्म को बिना आह किये चुप रहना चाहिए? वह महिला, जो जिन्दगी भर कई छोटे बड़े अवसरों पर महिला होने के नाते उपेक्षित व प्रताड़ित होती है, और उसके बावजूद पारिवारिक इज्जत को ढोती है, क्या ऐसी महिला को प्रताड़ना के विरूध्द स्वर उठाने का अधिकार भी नहीं?

    दूसरा सवाल यह कानून पुरूषों के खिलाफ़ है -यह कानून पुरूषों के खिलाफ़ नहीं है, ये कानून हिंसा के खिलाफ़ है। ये कानून सिविल कानून है, अगर घरेलू हिंसा की षिकायत की जाती है, तो उसमें पहले पुरूष को चेताया जायेगा और महिला को सुरक्षा मुहैया करायी जायेगी। पुरूष के खिलाफ़ तभी दण्डात्मक कार्यवाही होगी जब वह न्यायालय के आदेष की अवहेलना करता है। जो अभी तक कानून को पुरूष के खिलाफ़ होने की बात कही जा रही थी, असल में यह पुरूष के पौरूषत्व या कहें उसके पुरूष होने के ''अहम'' पर अंकुष लगाती है, जिसमें अब वह महिला को भोग या चीज न समझ कर महिला को एक मानव होने का अहसास दिलाती है।

    तीसरा सवाल इस कानून का दुरूप्रयोग होगा - दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसके दो पहलू न हो। जिन्दगी में खुषी है तो गम भी है। इसी तरह हर कानून के साथ है, लेकिन उस काननू को इस आधार पर नकारा नहीं जा सकता है कि इसका गलत इस्तेमाल होगा। इसकी जरूरत, इसकी महत्ता और इस कानून से लाभान्वित होने वाले समाज या वर्ग को देखना पड़ेगा। यह भी अक्सर कहा जाता है कि जेलों में दोषियों से ज्यादा निर्दोष लोग बंद पड़े हैं। इसका यह मतलब नहीं कि सारे कानून को नकार दिया जाये। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी कानून का गलत या सही इस्तेमाल हम सभी लोग करते है,

    एक मैसवा का सदस्य होने के नाते मेरा इस विषय पर लिखना व अपना पक्ष रखना और भी ज्यादा जरूरी बन जाता है। मैसवा इस कानून के पक्ष में है, इस कानून का स्वागत करता है, और जितना संभव हो पायेगा इस कानून को प्रचारित व प्रसारित करने की जिम्मेदारी लेता है। मेरा सभी पुरूषों से विनम्र अनुरोध है कि इस कानून की आवष्यकता व इसके सकारात्मक पहलुओं पर गौर कीजिए और हम पुरूषों को अपना आत्मविष्लेषण करना चाहिए कि हम पुरूषों के व्यवहार व सोच की वजह से आज यह कानून बनाने की जरूरत पड़ी।

Saturday, October 6, 2007

महिलाओं के मामले में हमारा समाज अभी भी आदिम युग का है

मनोज कुमार सिंह, गोरखपुर से हैं। एक मीडियाकर्मी है। आपने पूर्वांचल में भूख व गरीबी के कारण हो रही मौतों को उजागर किया, इसके साथ्-साथ महिला मुददों पर भी आप लिखते आये हैं। आप सामाजिक आन्‍दोलनों में काफी स‍क्रिय रहते हैं, चाहे वह रोजगार गारंटी हो, सूचना का अधिकार हो या महिला अधिकारों पर अभियान हो। लोकअभ्‍युदय अखबार का जेरे बहस कॉलम में रेगूलर लिखते हैं, यहां पर वे पूर्वी उ0प्र0 में लगातार बढ रही महिला हिंसा की कुछ घटनाओं का पित्रसत्‍तात्‍मक ढाचें में विश्‍लेषण कर रहे हैं।

देवरिया में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को मुम्बई ले जाकर वेश्‍यालय में बेच दिया। इस व्यक्ति ने तीस वर्ष पहले शादी की थी। पत्नी गांव रहती थी और वह गाजियाबाद में एक कारखाने में कार्य करता था। छह माह पहले वह गांव आया और पत्नी को गाजियाबाद ले गया। फिर उसे घुमाने के बहाने मुम्बई ले गया और वेश्‍यालय में बेच कर लौट आया। एक माह तक दुराचार का षिकार होती रही उसकी पत्नी मौका देखकर एक दिन भाग निकली और अपने मायके पहुंच कर आप बीती सुनाई। मामला पुलिस में गया और मुकदमा दर्ज किया गया।
गोरखपुर जनपद में एक परिवार के लोगों को जब पता चला कि उनकी जवान बेटी गांव के किसी लड़के से प्रेम करती थी तो उन्होने अपनी लड़की को जिन्दा जला दिया और बन्धे पर ले जाकर फेंक दिया। लड़की रात भर बंधे पर तड़फड़ाती चिल्लाती रही लेकिन उसकी मदद के लिये कोई नहीं आया। पह बंधे पर ही मर गई।
पूर्वांचल के ग्रामीण क्षेत्र की ये दो घटनाएं गांवो में महिला हिंसा की एक बानगी भर है। अगस्त माह में गोरखपुर जनपद में ग्रामीण क्षेत्र में महिला हिंसा की एक दर्जन घटनाएं मीडिया में आई। इनमें पिटाई, दुष्कर्म, दहेज हत्या, हत्या और अपहरण के मामले हैं। इनमें आधे से अधिक मामले महिला के साथ घर में हुई हिंसा या परिजनों के द्वारा की गई हिंसा के हैं। मीडिया में अधिकतर वहीं मामले आ पाते है जो पुलिस तक पहुंच जाते हैं। ज्यादातर मामले सामने नहीं आ पाते हैं। फिर भी जितने मामले आते है उससे समाज में महिला हिंसा की भयावह तस्वीर सामने आती है।
ये घटनाएं ये साबित करती है कि महिलाओं से व्यवहार के मामलें में हमारा समाज अभी भी कितना आदिम युग का है। कोई अपनी पत्नी को वेश्‍यालय में बेच रहा है तो कोई अपनी बेटी को इसलिए जला कर बंघे पर फेंक दे रहा है कि वह वयस्क होने के बाद भी कैसे किसी से प्रेम कर रही है। कोई अपने दामाद की इसलिए सरेबाजार कुल्हाड़ी मार कर हत्या कर देता है कि उसने उनकी बेटी से क्यो प्रेम विवाह किया। आमतौर पर ये घटनाएं समाज को विचलित भी नही करती क्योंकि उसे यह सब बहुत स्वाभाविक लगता है। देश महिला हिंसा की घटनाओं को रोक पाने में सक्षम नहीं हो पा रहे है। यह बहस का विषय हो सकता है कि हमारी कानून व्यवस्था क्यों महिला हिंसा को रोक पाने में कामयाब नहीं हो पा रही है। लेकिन महिला हिंसा का सबसे बड़ा कारण समाज का पितृसत्तात्मक होना है। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को दोयम दर्जे का समझा जाता है और माना जाता है कि वे शाशित होने के लिए ही बनी है। उन्हे गुलाम समझा जाता है यही कारण माना जाता है कि उनकी न कोई इच्छा है न कोई विचार। शिक्षित परिवारों मे पढ़ी-लिखी महिलाओं या लडकियों को बात-बात में कह दिया जाता है तुम क्या जानों, जैसे कि जानने का हक और निर्णय लेने का हक सिर्फ पुरूषों को ही है। इस मानसिकता और सोच के रहते महिलाओ को बराबरी के दर्जे पर लाना और उनके साथ भेदभाव व हिंसा को रोक पाना बहुत मुश्किल है। इसलिए इस सोच को बदलने के लिए बड़े पैमाने पर जनान्दोलन की जरूरत है। एक बड़ा जनान्दोलन ही समाज को चेतना के स्तर पर ऊंचाइयों पर ले जाता है और एक झटके से समाज को सड़ी-गली मान्यताओं , सोच व विचार से छुटकारा दिला देता है।

Wednesday, September 19, 2007

महिलाओं के नाम से जमीन की रजिस्ट्री में हुई बढोत्‍तरी

अनिल कुमार राय, देवरिया जिले के है, पेशे से पत्रकार हैं। समाजिक कार्यों में बढचढ कर इनकी भागीदारी रहती है। मैसवा के सक्रिय सदस्‍य हैं। इन्‍होंने देवरिया जिले में जमीन खरीदने में हो रही रजिस्‍ट़ी की खोज-पडताल की, जिसमें उन्‍हें कई चौकाने वाले तथ्‍य मिले और सबसे महत्‍वपूर्ण यह रहा है कि महिलाओं के नाम जमीने धड्ले से रजिस्‍टी की जा रही है। अनिल जी इस कदम को बहुत सकारात्‍मक देख रहे है और महिला सशक्तिरण के लिए आवश्‍यक कदम मान रहे हैं। प्रस्‍तुत है उनकी रिपोर्ट -


विगत वर्ष प्रदेश सरकार द्वारा महिलाओं के नाम से जमीन खरीदने पर रजिस्ट्री के समय स्टांप शुल्क
में दो प्रतिशत की कमी का असर दिखने लगा है। रजिस्ट्री के समय दो प्रतिशत स्टांप पेपर के कम लगने के चलते अधिकांश जमीनों के बैनामे महिलाओं के नाम होने लगे हैं। इससे महिलाएं जमीन के मामले में सशक्त होने लगी ह्रैं।
देवरिया जिले में कुल पाँच तहसीलें हैं। यहां से मिले आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2006-07 में कुल 17402 लेखपत्र हुए। इनमें बैनामा, बन्धक एवं पट्टा आदि भी शामिल है। इन लेखपत्रों में जहां 10106 महिलाओं के नाम से जमीने खरीदी गयीं वहीं सिर्फ 7296 पुरूषों के नाम लेखपत्र रजिस्टर्ड हुए। महिलाओं के नाम पर जमीन के खरीदने के चलते चार करोड़ सत्तहर लाख पैंतालिस हजार दो सौ उन्तीस रूपया स्टैंप शुल्क में छूट दिया गया। इस सत्र में चार हजार आठ सौ एक रजिस्ट्री तीन महीनों में हुईं। इनमें भी महिलाओं के नाम जहां दो हजार नौ सौ नौ रजिस्टं हुईं वहीं पुरूषों के नाम सिर्फ 1892। तीन महीनों में ही महिलाओं को 14075187 रूपया का स्टांप शुल्क में छूट दिया गया। इस तरह से 15 महीनों में 13015 महिलाओं व 9184 पुरूषों के नाम से बनामे हुए।
यहां उल्लेखनीय है कि देवरिया जिले में पुरूषों के मुकावले महिलाओं की संख्या भी अधिक है। पहले संख्या अधिक होते हुए भी महिलाओं के नाम से बहुत कम ही जमीन ली जाती थी। अब नये आदेश व 2 प्रतिशत स्टांप शुल्क में छूट के चलते पुरूष महिलाओं के नाम से ही जमीनें खरीद रहे हैं। यहां बताते चलें कि बैनामें के दौरान पुरूषों के नाम पर 8 व महिलाओं के नाम पर 6 प्रतिशत स्टांप शुल्क लगता है। इस तरह जमीन के मामले में धीरे-धीरे मजबूत होने लगी हैं। विगतवर्ष आए शासनादेश के चलते महिलाएं सशक्त होने लगी हैं। कुछ लोग तो इस आदेश को महिला सशक्तिकरण का एक बेहतर माध्यम मान रहे हैं। ऐसे लोगों का मानना है कि जब जमीन पर महिलाओं का हक होगा तो उनके उत्पीड़न व शोषण में भी कमी आएगी।
अनिल कुमार राय, देवरिया

Monday, August 27, 2007

यौन शिक्षा पर इतना बवाल क्‍यों

डॉ0 संजय सिंह, महात्‍मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में समाजकार्य विभाग में रीडर हैं। पढाने के साथ-साथ सामाजिक आन्‍दोलन में आपकी सक्रिय भागीदारी रहती है। पिछले दो महीनों से यौन शिक्षा को लेकर काफी बवाल राज्‍य के अलावा देश भर में मचा हुआ था, और कई राज्‍यों में भारी विरोध के चलते लागू नहीं हो पाया। सबसे चौकाने वाली व महत्‍वपूर्ण देखने वाली जो बात है, शिक्षक संघ यौन शिक्षा के विरोध में खुलकर सामने आया और यहां तक उन्‍होंने इन किताबों को जलाकर अपना विरोध भी दर्ज किया। यौन शिक्षा को लेकर उठे बवाल व शिक्षक से लेकर आम जन मानस के लोगों की मानसिकता को लेकर डॉ0 संजय यहा पर अपनी बात व राय सबके साथ बांट रहे हैं।

यौन शिक्षा को लेकर आम लोगों, धार्मिक नेताओं, राजनेताओं, शिक्षकों एवं राज्य सरकारों में जो भ्रम की स्थिति बनी हुई है या ऐसा कह सकते है कि '' सॉप - छछुंदर'' की स्थिति बनी हुई है। राज्य सरकारें एक कदम आगे बढ़ाती हैं तो दो कदम पीछे खींचती हैं। कोई इसे आवश्‍यक तो कोई अनावश्‍यक बताता है। तो कोई इसे भारत की बिरासत के विरुध्द बहुराष्ट्रीय कम्पनीयों का अभियान बताता है।
लेकिन वास्तविकता - ''कौवा कान ले गया'' जैसी है।
इसे सम्पूर्ण सन्दर्भ में समझने की कोशिश न कर बिरोध जता कर लोग अपनी पीठ थपथपवाकर भारतीय संस्कृति के रक्षकों की पंक्ति में सम्मिलित होने की थोथी कोशिश कर रहे है । जबकि उनके पास इस बात का कोई जबाब नही है कि एच. आई. वी. / एड्स जैसी बिमारी भ्रमात्मक यौनिकता, लिंगभेद, यौन उत्पीड़न का क्या कारगर उपाय है? क्या मात्र नैतिकता एवं ब्रह्मचर्य का पाठ पढ़ाने से उपरोक्त को रोका जा सकता है? यदि ऐसा होता तो धार्मिक स्थलों पर यौनाचार की घटनाएं नहीं होनी चाहिए लेकिन घटनाएं होती हैं और उन्हीं द्वारा जो नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं।
यथार्थ यह है कि लोगों में इतना नैतिक बल नहीं बचा कि वे इस विषय को पूरी संवेदनशीलता एवं गंभीरता से पढ़ सके या विद्यार्थियों को पढ़ा सकें। आखिर किसके भरोसे किशोर अथवा युवा यौन शिक्षा ग्रहण करें? नीम - हकीमों के भरोसे, अश्‍लील साहित्यों, अथवा अधकचरी जानकारी रखने वाले साथियों से। क्या यह उपयुक्त होगा? आखिर कब तक हम सच्चाई को नकारते रहेंगे? कब तक यौन एवं यौनिकता को गोपनीय बनाये रखेंगे? क्या यह सत्य नही है कि प्रत्येक मनुष्य जन्म से मृत्युपर्यन्त एक यौनिक प्राणी होता है एवं अपने यौन के आधार पर ही आचरण करता है। प्रत्येक मनुष्य प्रेम, निकटता, लगाव एवं यौनिक उत्तेजना की भावना का अनुभव करने की क्षमता के साथ जन्म लेता है और यह विश्‍वास करता है कि यह योग्यता जीवन भर बनी रहे। लेकिन विभिन्न कारकों जैसे उम्र, लैंगिक भूमिका, लालन-पालन, शिक्षा. सामाजिक पर्यावरण, आत्म -सम्मान, अपेक्षाएं, एवं स्वाथ्य की स्थिति (शारीरिक एवं मानसिक ) के अनुसार हमारी यौनिकता, आवश्‍यकताओं तथा प्रेम को अभिव्यक्त करने के तरीकों में अन्तर होता है। यौनिकता बहुत गहराई से सामाजिक लिंगभेद, सामाजिक लिंगभेद सम्बन्धी व्यवस्था एवं लैंगिक भूमिकाओं से जुड़ी होती हैं। लिंगभेद सम्बन्धी व्यवस्था कितनी समानतावादी अथवा विभेदकारी है, यौनिकता तथा इसकी अभिव्यक्ति की सामाजिक स्वीकृति द्वारा बड़े अच्छे से समझा जा सकता है।
लैंगिकता एवं यौनिकता दोनों ही हमारी पहचान के हिस्से हैं। तथा यह समाज एवं संस्कृति द्वारा निर्मित की जाती है जो कि अभिभावकों, भाई- बहनों, मित्र- समूहों, शिक्षकों, धार्मिक ग्रन्थों एवं अन्य साहित्यों द्वारा सिखाई जाती हैं। प्रश्‍न उठता है सिखाने की पद्वति, विषय वस्तु, एवं उपागम पर । क्या जो यौन शिक्षा परम्परागत रुप से सिखाई जाती है वह उपयुक्त है? क्या वह सभी को उपलब्ध होता है? यह एक व्यापक विष्लेषण का विषय है। यदि वह उपयुक्त होता तो इतनी भारी मात्रा में यौन उत्तेजना बढ़ाने वाली दवाइयों की विक्री नहीं होती, जगह-जगह गली-मुहल्लों में मर्दाना ताकत बढ़ाना का दावा करने वाली नीम-हकीमों की फौज नहीं खड़ी होती। इतनी मात्रा में युवा दिग्भ्रमित न होते, एच. आई. वी. / एड्स का इतना प्रसार न होता और न ही इतनी मात्रा में यौन उत्पीड़न, बलात्कार एवं यौन हिंसाएँ होती।
अत: हमें स्वीकार करना होगा कि यौन शिक्षा हमारे जीवन की एक अनिवार्यता है। यह तथ्यों की जानकारी मात्र नही है। यह एक संवेदनशील विषय है तथा ऐसे उपागमों द्वारा शिक्षार्थी को शिक्षा दी जाए कि वह विषय को गम्भीरता से समझ सके। शिक्षक को कक्षा का वातावरण इस प्रकार निर्मित करना पड़ेगा कि विद्यार्थी इमानदारी से अपने जीवन जीने के तरीके, यौनिकता एवं प्रेम के अनुभवओं पर खुलकर चर्चा कर सकें । तभी शिक्षक उनके मूल्यो, अभिवृत्तियो एवं व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन ला सकेगें । एवं विद्याथी जीवन में स्वस्थ निर्णय लेने योग्य हो सकेगा । इससे उनका आत्म सम्मान भी बढ़ता है क्योकि यौन शिक्षा पहचान एवं मानवता से सम्बंधित है ।
सहभागी उपागमो एवं तकनीकों जैसे वैयक्तिक चर्चा, मूल्य स्पष्टीकरण के खेल, सामाजिक लिंगभेद पर समूह चर्चा, एवं छोटे- छोटे समूहो में अनुभवो का बांटना इत्यादि का प्रयोग कर हम शिक्षण को ग्राहय बना सकते है, एवं यह एक थोपा गया विषय नही लगेगा।
दरअसल वास्तविक तथ्य एवं मूल्य दो ऐसे स्तम्भ हैं जिस पर यौन शिक्षा निर्भर करती है। इसके लिए आवश्‍यक है कि शिक्षक स्वयं की यौनिकता, इससे जुड़े मूल्यों विषेषकर किशोरों की यौनिकता सम्बन्धी मूल्यों पर खुल कर चर्चा करें। यदि शिक्षक ऐसा करते है तो यह उन्हें प्रभावशाली यौन शिक्षा के पॉच सूत्रों को समझने में मदद करेगा। वह है- यौनिकता के सम्बन्ध में सकारात्मक सोच, स्वीकृति का सिद्वान्‍त वास्तविकता को स्वीकार करना, अर्न्तक्रियात्मक उपागम एवं अनिर्णायक अभिवृत्ति।
यौन शिक्षा निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है केवल युवाओं के लिए ही नहीं बल्कि शिक्षकों, नीतिनिर्माताओं, प्रशिक्षकों एवं सहर्जकत्ताओं के लिए भी। अत: भली प्रकार यौन शिक्षा प्रदान करने, एवं इसके अनुश्रवण के लिए निम्न कदम महत्वपूर्ण है-
- नीति- निर्माताओं के लिए संवेदनशीलता कार्यशालाओं का आयोजन जो कि प्रक्रिया उन्मुखी हो ताकि रणनीतियों एवं नीतियों के निर्माण की प्रक्रिया में सहायता प्रदान कर सके।
- शिक्षकों एवं प्रशिक्षकों को यौनिकता पर आधारभूत प्रषिक्षण ।
- प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण।
- स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों का इन-सर्विस प्रशिक्षण

आप डॉ0 संजय सिंह को सीधे इस पते पर भी लिखे सकते हैं sanjaysinghdr@sifymail.com

Thursday, August 23, 2007

ये कैसी मुहब्‍बत...........

बात दिल्‍ली शहर की है, देश की राजधानी, जो विकास के मामले में अग्रणी है। लेकिन महिला व पुरूष के मामले में उस शहर की सोच भी देश के बाकि हिस्‍सों की तरह ही है। 13 अगस्‍त को हुई एक घटना ने दिल को हिला कर रख दिया और इस घटना ने मर्दवादी मानसिकता को फिर उजागर किया।
चांदनी नाम की एक लड्की को उसके पडौस में ही रहने वाले दो लड्कों ने जिंदा जला डाला। 16 साल की चांदनी अपनी मां के साथ रहती थी। वह अभी कक्षा 8 में पढती थी। उसकी जिन्‍दगी सामान्‍य चल रही थी, लेकिन कुछ समय से नौशाद नाम का लड्का उसे आये दिन परेशान करता था। नौशाद उसके पडौस में ही रहता था। एक दिन जब नौशाद ने चांदनी का हाथ पकड् लिया और उससे कहना लगा कि वह उससे प्‍यार करता है, इस पर चांदनी ने इंकार किया और कहा कि मैं तुम्‍हे से प्‍यार नहीं करती।
चांदनी का इंकार नौशाद को बर्दाश्‍त नहीं हुआ और 13 अगस्‍त को अपना बदला लेने के लिए अपने दोस्‍त के साथ चांदनी के घर घुस गया, उस वक्‍त चांदनी अकेली थी। चांदनी पर कैरोसीन छिडक कर आग लगा दी। चांदनी को सफदरगंज अस्‍पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसने दम तोड् दिया।
इस घटना ने समाज के संवदेनशील लोगों को शर्मसार किया। मैं बहुत आहत हूं, यह घटना मर्दवादी सोच को उजागर करती है कि एक पुरूष होने के नाते उसे लड्की कैसे इंकार कर सकती है, अस्‍वीकारर्यता को स्‍वीकार न करना, उसे अपना अहम बना लेना, लड्की पर अपना हक जमाना, वह मेरी नहीं तो किसी और की भी नहीं, इसलिए उसे सबक सिखाना, अगर वह मेरी नहीं तो उसे जिंदा रहने का कोई अधिकार नहीं आदि, आदि।
इस क्रूर मानसिकता के चलते या तो लड्की को मार दिया जाता है, उसका बलात्‍कार किया जाता है या उस पर तेजाब डाल दिया जाता है। मैं यहां पर उस मानसिकता का उठाना चाहता हूं जो लड्कों के अन्‍दर बस रही है, पनप रही है। क्‍‍या जिसे प्‍यार करते हैं, उसके साथ हम ऐसा कर सकते हैं। बात तब और भी ज्‍यादा गंभीर हो जाती है, जब आप खुद ही मान बैठते हैं कि मैं उससे प्‍यार करता हूं और वो मेरी है। किसी पर जबरन हक जमाना क्‍या न्‍यायोचित है, क्‍या केवल हमारी ही भावनाएं है, जो हम चाहेंगे वो ही होगा।
बहुत बहस का विषय है। इस पर व्‍यापक बहस की जरूरत है।
मैंने इस विषय को बहस छेड्ने के लिए उठाया है, इस‍लिए आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार है।

Thursday, August 16, 2007

आसान नहीं है राह जेण्‍डर समानता की

‘’ये हुई ना मर्दों वाली बात’’ वाली डॉक्‍यूमेंटरी दिखाने के बाद अक्‍सर ये सवाल उठता है कि ल‍ड्कियों के लिए किस तरह का पुरूष ‘आईडियल’ है। तो अक्‍सर ये ही सुनने को मिलता है। हमें तो हटटा-कटटा, दमदार, सुडौल, अच्‍छा खासा कमाने वाला लडका ही चाहिए। इस तरह के विचार सुनने को आते हैं, लड्कियों से। मेरा यह अनुभव विश्‍ववि़द्यालय में फिल्‍म स्‍क्रीनिंग करते हुआ है।
मैसवा के साथी पुरूष व लडके जो काफी लम्‍बे समय से मैसवा की गतिविधियों में शामिल हैं कि प्रतिक्रिया अक्‍सर होती है है कि रवि भाई हमारे लिए तो कोई जगह ही नहीं है। लड्कियां जो सोचती है, उस खांचे में हम तो फिट होते ही नहीं हैं। लड्के कहते हैं कि अब हम जेण्‍डर समानता की बात करते हैं और आसपास व घरों में भी सभी तरह के कामों में मदद करते हैं जिसकी वजह से बाकि लडकों के मजाक के पात्र बनाते हैं, और कई बार तो लड्कियों के भी मजाक के पात्र बनते हैं। बडी उहापोह की स्थिति रहती है।

मैं यहां पर समझने व लिखने की कोशिश कर रहा हूं कि आखिर ऐसा क्‍यों होता है कि एक तरु तो हम जेण्‍डर संवदेनशील पुरूष चाहते हैं, लेकिन उसे अपने जीवन के साथ नहीं जोड पाते। असल जिन्‍दगी में हमें उसी तरह मर्दवादी लड्का या पुरूष चाहिए होता है। यही भाव लड्कों में भी है, दोस्‍ती के दायरे में हमें हंसी मजाक करने वाली, बोल्‍ड लडकी ही चाहिए होती है, लेकिन असल जिन्‍दगी में हम फिर सामाजिक ढाचे में फिट लड्की ही चाहते हैं। लड्कों व लड्कियों का सा‍माजिकरण समाजि की अपेक्षाओं के आधार पर एक तरह के ढांचे में हुआ है। जिसमें लडकों के लिए कुछ अलग मानक हैं, उन्‍हें अलग तरह के दिखने का है, ठीक लड़कियों के लिए भी अलग मानक है, जिसमें उन्‍हें अलग तरह का दिखना है। ये मानक ही आदर्श हैं, इस तरह का भाव बचपन से ही हमारे अंदर डाल दिया जाता हैं। अगर इस से इतर कुछ भी हुआ तो समाज को बहुत अजीब लगता है और अक्‍सर उसका कई स्‍वरूपों में विरोध भी होता है। जिसकी वजह से हर किसी को समाज द्वारा तय किये गये मानकों पर ही चलना ज्‍यादा सुगम लगता है। समाज इस तरह की सोच भी पैदा कर देता है कि इन मानकों पर खरा उतरना जरूरी है वरना आपको असामान्‍य घोषित कर दिया जायेगा। आपको समाज में इस्‍तेमाल होने वाले तुच्‍छ व नीचा दिखाने वाले शब्‍दों से संबोधित किया जायेगा। ये इसलिए किया जाता है कि आप उस बदलाव में बहुत आगे न जा पाये और पुन समाज द्वारा तय मूल्‍यों पर लौट आयें, दूसरी वजह है कि दूसरे व्‍यक्ति इससे सबक लें और समाज के मूल्‍यों को ठुकराने व चुनौती देने की कोशिश न करें।
मुझे लगता है कि ऐसी स्थिति में हम दो पक्षों में बंटे रहते हैं, एक मन व दूसरा दिमाग। मन कुछ और कहता है तो दिमाग कुछ और कहता है। इस मन और दिमाग के बीच में अंतद्धंद चलता रहता है। दिमाग इसलिए हाबी रहता है क्‍योंकि वह सामाजिक न‍जरिये से सोचता है। हम सब दिमागी रूप से परम्‍परागत सोच की गुलामी को जी रहे होते हैं व संकीर्ण विचारधाराओं में जकडे हुए हैं।
यहां पर लड्कों की मानसिक स्थिति को समझने की जरूरत है क्‍यों वह इस तरह की बात कर रहा है। उसे र्स्‍पोटिंग स्स्टिम नहीं मिल रहा है। उसके मन में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं, उनमें से एक है – आसान नहीं है राह जेण्‍डर समानता की।
साथियों इन उलझनों पर आपके जवाब आमंत्रित हैं।



Friday, August 10, 2007

लोक अभ्‍युदय क्‍यों

मैसवा पिछले 5 सालों से जेण्‍डर समानता व महिला हिंसा के मुददे पर पुरूषों के साथ काम कर रहा है। मैसवा का मानना है कि महिला हिंसा सिर्फ महिलाओं का मुददा नहीं है, अपितु पूरे समाज का मुददा है। इसके लिए समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा, जिसमें पुरूष अहम किरदार है।

मैसवा पिछले एक साल से एक मासिक अखबार लोक अभ्‍युदय का प्रकाशन कर रहा है। मैसवा से जुडे साथी इस अखबार को संचालित करते हैं। इस अखबार से ग्रामीण पत्र‍कार भी जुडे और आज राष्‍टीय अखबारों में जेण्‍डर द़ृष्टिकोण के साथ खबरें लिख रहे हैं।

लोक अभ्‍युदय इस लिए प्रकाशित किया जा रहा हैं कि आज आम अखबारों में सामाजिक संघर्षों के लिए कोई जगह नहीं हैं। लोक अभ्‍युदय उस कमी को पूरी करेगा। लोक अभ्‍युदय आम लोगों तक सामाजिक परिवर्तन व उसकी मुदद्दों की सार्थकता को ले जायेगा। लोक अभ्‍युदय जेण्‍डर समानता व समाजिक न्‍याय के इस संघर्ष व बहस में आम लोगों को जोडेगा। इन उददेश्‍यों के लिए लोक अभ्‍युदय की शुरूआत की।

लोक अभ्‍युदय उत्‍तर प्रदेश व उत्‍तरांचल के साथियों के मदद से आम लोगों तक इस अखबार को पहुंचाया जा रहा है, जिससे आम लोगों तक जेण्‍डर समानता की बात पहुंच सके। इस क्रम में हम इस अखबार को आप लोगों तक भी पहंचाना चाहते हैं और आप लोगों के भी सुझाव व लेख चाहते हैं, जो राष्‍टीय व अन्‍य स्‍तर पर चल रहे हैं।