- घरेलू हिंसा से महिलाओं का बचाव कानून 2005
घरेलू हिंसा कानून 2005 के लगभग एक साल के सफर में इस कानून को पुरूषों के खिलाफ़, घरफोडू व भारतीय संस्कृति के खिलाफ़ आदि तरीके से स्थापित करने की कोषिषे पूरजोर तरीके से की जा रही हैं। आम समाज को इस कानून के दुरूप्रयोग का खौफ दिखाया जा रहा है। 26 अगस्त 2007 को दिल्ली में ''पुरूष बचाओ'' एक बड़ी रैली आयोजित हुई, जिसे मीडिया ने जबरदस्त तरीके से हाईलाईट किया, उसे रैली में इस कानून के विरोध में स्वर साफ सुनायी दे रहे थे।
मेरे जेहन में सवाल उठ रहा है कि आखिर क्यों समाज विषेषकर पुरूष इससे डरा हुआ है, क्यों इसका विरोध है? दबे पांव राजनैतिक लोग, मीडिया व समाज के प्रबुध्द वर्ग भी अपनी आपत्ति दर्ज कर रहे हैं।
इस कानून की जितनी चर्चा इसके सकारात्मक पहलू और इसकी सार्थकता पर हो रही है, उससे कहीं ज्यादा इस कानून के विरोध में और इसकी निरर्थकता को लेकर चर्चाएं हो रही हैं। तरह-तरह की बातें इस कानून के लिए बारे में कहीं जा रही है, इसके औचित्य पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं।
मैं यहां पर महिला व बाल विकास केन्द्रिय मंत्री रेणुका चौधरी के उस कथन का हवाला देना चाहूंगा, जिसमें उन्होंने कहा कि ''इस कानून से पुरूषों में डर पैदा हुआ है तो मान लीजिए कानून सफल हो गया।''
मेरे हिसाब से इस कथन का समाजषास्त्रीय विष्लेषण यह कहता है कि कानून पितृसत्तात्मक रूपी पूरे ढ़ाचे पर वार करता है, इस ढ़ाचे में जहां अभी तक पुरूष अपने पुरूष होने तथा महिला का महिला होने के नाते उस पर अपनी रोब जमा रहा था, उसे चोट पहुंच रही है, इस कानून से पुरूष के पौरूषत्व पर चोट पहुंच रही है। यह पुरूष को नुकसान नहीं अपितु पुरूष के पौरूषत्व पर हमला कर रहा है। जिससे पुरूष डरे हैं कि कहीं उन्हें पितृसत्ता के रूप में जो सत्ता मिली है, वह चली न जाये। यहां पर इसके स्वर इसलिए तीव्र और ज्यादा है क्योंकि यह कानून पितृसत्तात्मक ढ़ाचें पर वार कर रहा है। पुरूष अपने तथाकथित अधिकारों पर वैधानिक रोक लगाने से डर रहे हैं।
मैं यहां पर इस कानून को लेकर उठे सवालों का विष्लेषण करने की कोषिष कर रहा हूं,। जिसमें पहला सवाल यह कानून घरफोडू है - तो क्या घर को बनाये रखने की जिम्मेदारी केवल महिला की है? क्या घर में शांति बनाये रखने के लिए उसे अपने उपर हो रहे सारे जुर्म को बिना आह किये चुप रहना चाहिए? वह महिला, जो जिन्दगी भर कई छोटे बड़े अवसरों पर महिला होने के नाते उपेक्षित व प्रताड़ित होती है, और उसके बावजूद पारिवारिक इज्जत को ढोती है, क्या ऐसी महिला को प्रताड़ना के विरूध्द स्वर उठाने का अधिकार भी नहीं?
दूसरा सवाल यह कानून पुरूषों के खिलाफ़ है -यह कानून पुरूषों के खिलाफ़ नहीं है, ये कानून हिंसा के खिलाफ़ है। ये कानून सिविल कानून है, अगर घरेलू हिंसा की षिकायत की जाती है, तो उसमें पहले पुरूष को चेताया जायेगा और महिला को सुरक्षा मुहैया करायी जायेगी। पुरूष के खिलाफ़ तभी दण्डात्मक कार्यवाही होगी जब वह न्यायालय के आदेष की अवहेलना करता है। जो अभी तक कानून को पुरूष के खिलाफ़ होने की बात कही जा रही थी, असल में यह पुरूष के पौरूषत्व या कहें उसके पुरूष होने के ''अहम'' पर अंकुष लगाती है, जिसमें अब वह महिला को भोग या चीज न समझ कर महिला को एक मानव होने का अहसास दिलाती है।
तीसरा सवाल इस कानून का दुरूप्रयोग होगा - दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसके दो पहलू न हो। जिन्दगी में खुषी है तो गम भी है। इसी तरह हर कानून के साथ है, लेकिन उस काननू को इस आधार पर नकारा नहीं जा सकता है कि इसका गलत इस्तेमाल होगा। इसकी जरूरत, इसकी महत्ता और इस कानून से लाभान्वित होने वाले समाज या वर्ग को देखना पड़ेगा। यह भी अक्सर कहा जाता है कि जेलों में दोषियों से ज्यादा निर्दोष लोग बंद पड़े हैं। इसका यह मतलब नहीं कि सारे कानून को नकार दिया जाये। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी कानून का गलत या सही इस्तेमाल हम सभी लोग करते है,
एक मैसवा का सदस्य होने के नाते मेरा इस विषय पर लिखना व अपना पक्ष रखना और भी ज्यादा जरूरी बन जाता है। मैसवा इस कानून के पक्ष में है, इस कानून का स्वागत करता है, और जितना संभव हो पायेगा इस कानून को प्रचारित व प्रसारित करने की जिम्मेदारी लेता है। मेरा सभी पुरूषों से विनम्र अनुरोध है कि इस कानून की आवष्यकता व इसके सकारात्मक पहलुओं पर गौर कीजिए और हम पुरूषों को अपना आत्मविष्लेषण करना चाहिए कि हम पुरूषों के व्यवहार व सोच की वजह से आज यह कानून बनाने की जरूरत पड़ी।
Monday, October 8, 2007
यह डर पुरूष का है या उसके पुरूषत्व का
Saturday, October 6, 2007
महिलाओं के मामले में हमारा समाज अभी भी आदिम युग का है
मनोज कुमार सिंह, गोरखपुर से हैं। एक मीडियाकर्मी है। आपने पूर्वांचल में भूख व गरीबी के कारण हो रही मौतों को उजागर किया, इसके साथ्-साथ महिला मुददों पर भी आप लिखते आये हैं। आप सामाजिक आन्दोलनों में काफी सक्रिय रहते हैं, चाहे वह रोजगार गारंटी हो, सूचना का अधिकार हो या महिला अधिकारों पर अभियान हो। लोकअभ्युदय अखबार का जेरे बहस कॉलम में रेगूलर लिखते हैं, यहां पर वे पूर्वी उ0प्र0 में लगातार बढ रही महिला हिंसा की कुछ घटनाओं का पित्रसत्तात्मक ढाचें में विश्लेषण कर रहे हैं।
देवरिया में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को मुम्बई ले जाकर वेश्यालय में बेच दिया। इस व्यक्ति ने तीस वर्ष पहले शादी की थी। पत्नी गांव रहती थी और वह गाजियाबाद में एक कारखाने में कार्य करता था। छह माह पहले वह गांव आया और पत्नी को गाजियाबाद ले गया। फिर उसे घुमाने के बहाने मुम्बई ले गया और वेश्यालय में बेच कर लौट आया। एक माह तक दुराचार का षिकार होती रही उसकी पत्नी मौका देखकर एक दिन भाग निकली और अपने मायके पहुंच कर आप बीती सुनाई। मामला पुलिस में गया और मुकदमा दर्ज किया गया।
गोरखपुर जनपद में एक परिवार के लोगों को जब पता चला कि उनकी जवान बेटी गांव के किसी लड़के से प्रेम करती थी तो उन्होने अपनी लड़की को जिन्दा जला दिया और बन्धे पर ले जाकर फेंक दिया। लड़की रात भर बंधे पर तड़फड़ाती चिल्लाती रही लेकिन उसकी मदद के लिये कोई नहीं आया। पह बंधे पर ही मर गई।
पूर्वांचल के ग्रामीण क्षेत्र की ये दो घटनाएं गांवो में महिला हिंसा की एक बानगी भर है। अगस्त माह में गोरखपुर जनपद में ग्रामीण क्षेत्र में महिला हिंसा की एक दर्जन घटनाएं मीडिया में आई। इनमें पिटाई, दुष्कर्म, दहेज हत्या, हत्या और अपहरण के मामले हैं। इनमें आधे से अधिक मामले महिला के साथ घर में हुई हिंसा या परिजनों के द्वारा की गई हिंसा के हैं। मीडिया में अधिकतर वहीं मामले आ पाते है जो पुलिस तक पहुंच जाते हैं। ज्यादातर मामले सामने नहीं आ पाते हैं। फिर भी जितने मामले आते है उससे समाज में महिला हिंसा की भयावह तस्वीर सामने आती है।
ये घटनाएं ये साबित करती है कि महिलाओं से व्यवहार के मामलें में हमारा समाज अभी भी कितना आदिम युग का है। कोई अपनी पत्नी को वेश्यालय में बेच रहा है तो कोई अपनी बेटी को इसलिए जला कर बंघे पर फेंक दे रहा है कि वह वयस्क होने के बाद भी कैसे किसी से प्रेम कर रही है। कोई अपने दामाद की इसलिए सरेबाजार कुल्हाड़ी मार कर हत्या कर देता है कि उसने उनकी बेटी से क्यो प्रेम विवाह किया। आमतौर पर ये घटनाएं समाज को विचलित भी नही करती क्योंकि उसे यह सब बहुत स्वाभाविक लगता है। देश महिला हिंसा की घटनाओं को रोक पाने में सक्षम नहीं हो पा रहे है। यह बहस का विषय हो सकता है कि हमारी कानून व्यवस्था क्यों महिला हिंसा को रोक पाने में कामयाब नहीं हो पा रही है। लेकिन महिला हिंसा का सबसे बड़ा कारण समाज का पितृसत्तात्मक होना है। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को दोयम दर्जे का समझा जाता है और माना जाता है कि वे शाशित होने के लिए ही बनी है। उन्हे गुलाम समझा जाता है यही कारण माना जाता है कि उनकी न कोई इच्छा है न कोई विचार। शिक्षित परिवारों मे पढ़ी-लिखी महिलाओं या लडकियों को बात-बात में कह दिया जाता है तुम क्या जानों, जैसे कि जानने का हक और निर्णय लेने का हक सिर्फ पुरूषों को ही है। इस मानसिकता और सोच के रहते महिलाओ को बराबरी के दर्जे पर लाना और उनके साथ भेदभाव व हिंसा को रोक पाना बहुत मुश्किल है। इसलिए इस सोच को बदलने के लिए बड़े पैमाने पर जनान्दोलन की जरूरत है। एक बड़ा जनान्दोलन ही समाज को चेतना के स्तर पर ऊंचाइयों पर ले जाता है और एक झटके से समाज को सड़ी-गली मान्यताओं , सोच व विचार से छुटकारा दिला देता है।
देवरिया में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को मुम्बई ले जाकर वेश्यालय में बेच दिया। इस व्यक्ति ने तीस वर्ष पहले शादी की थी। पत्नी गांव रहती थी और वह गाजियाबाद में एक कारखाने में कार्य करता था। छह माह पहले वह गांव आया और पत्नी को गाजियाबाद ले गया। फिर उसे घुमाने के बहाने मुम्बई ले गया और वेश्यालय में बेच कर लौट आया। एक माह तक दुराचार का षिकार होती रही उसकी पत्नी मौका देखकर एक दिन भाग निकली और अपने मायके पहुंच कर आप बीती सुनाई। मामला पुलिस में गया और मुकदमा दर्ज किया गया।
गोरखपुर जनपद में एक परिवार के लोगों को जब पता चला कि उनकी जवान बेटी गांव के किसी लड़के से प्रेम करती थी तो उन्होने अपनी लड़की को जिन्दा जला दिया और बन्धे पर ले जाकर फेंक दिया। लड़की रात भर बंधे पर तड़फड़ाती चिल्लाती रही लेकिन उसकी मदद के लिये कोई नहीं आया। पह बंधे पर ही मर गई।
पूर्वांचल के ग्रामीण क्षेत्र की ये दो घटनाएं गांवो में महिला हिंसा की एक बानगी भर है। अगस्त माह में गोरखपुर जनपद में ग्रामीण क्षेत्र में महिला हिंसा की एक दर्जन घटनाएं मीडिया में आई। इनमें पिटाई, दुष्कर्म, दहेज हत्या, हत्या और अपहरण के मामले हैं। इनमें आधे से अधिक मामले महिला के साथ घर में हुई हिंसा या परिजनों के द्वारा की गई हिंसा के हैं। मीडिया में अधिकतर वहीं मामले आ पाते है जो पुलिस तक पहुंच जाते हैं। ज्यादातर मामले सामने नहीं आ पाते हैं। फिर भी जितने मामले आते है उससे समाज में महिला हिंसा की भयावह तस्वीर सामने आती है।
ये घटनाएं ये साबित करती है कि महिलाओं से व्यवहार के मामलें में हमारा समाज अभी भी कितना आदिम युग का है। कोई अपनी पत्नी को वेश्यालय में बेच रहा है तो कोई अपनी बेटी को इसलिए जला कर बंघे पर फेंक दे रहा है कि वह वयस्क होने के बाद भी कैसे किसी से प्रेम कर रही है। कोई अपने दामाद की इसलिए सरेबाजार कुल्हाड़ी मार कर हत्या कर देता है कि उसने उनकी बेटी से क्यो प्रेम विवाह किया। आमतौर पर ये घटनाएं समाज को विचलित भी नही करती क्योंकि उसे यह सब बहुत स्वाभाविक लगता है। देश महिला हिंसा की घटनाओं को रोक पाने में सक्षम नहीं हो पा रहे है। यह बहस का विषय हो सकता है कि हमारी कानून व्यवस्था क्यों महिला हिंसा को रोक पाने में कामयाब नहीं हो पा रही है। लेकिन महिला हिंसा का सबसे बड़ा कारण समाज का पितृसत्तात्मक होना है। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को दोयम दर्जे का समझा जाता है और माना जाता है कि वे शाशित होने के लिए ही बनी है। उन्हे गुलाम समझा जाता है यही कारण माना जाता है कि उनकी न कोई इच्छा है न कोई विचार। शिक्षित परिवारों मे पढ़ी-लिखी महिलाओं या लडकियों को बात-बात में कह दिया जाता है तुम क्या जानों, जैसे कि जानने का हक और निर्णय लेने का हक सिर्फ पुरूषों को ही है। इस मानसिकता और सोच के रहते महिलाओ को बराबरी के दर्जे पर लाना और उनके साथ भेदभाव व हिंसा को रोक पाना बहुत मुश्किल है। इसलिए इस सोच को बदलने के लिए बड़े पैमाने पर जनान्दोलन की जरूरत है। एक बड़ा जनान्दोलन ही समाज को चेतना के स्तर पर ऊंचाइयों पर ले जाता है और एक झटके से समाज को सड़ी-गली मान्यताओं , सोच व विचार से छुटकारा दिला देता है।
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